Tuesday, 24 April 2018

संस्कार

हमारे देश में नवरात्रि में कन्या पूजन हो रहे हैं। शादियों में कन्या दान हो
रहे हैं। इसी देश में कन्याओं के साथ बलात्कार की घटनाएं बढ़ रही हैं। 
सरकारों द्वारा बेटियों की सुरक्षा के लिए अलग से योजनाएं तक बनाई
जाने लगी हैं। समाज का अर्द्धाग अपने ही शेष अर्द्धाग पर आक्रमण
करने लगा है। लेकिन ऐसा होने के पीछे कारण क्या है? इसमें किसी
का भी मूल में जाने का मन नही। क्यूंकि हमारा आचरण झूठे अध्यात्म
पर टिका है।

हम, सृष्टि का उद्भव ब्रह्म और माया के युगल तत्व रूप से मानते आए हैं।
ब्रह्म केन्द्र में रहता है, माया उसे आवरित करके स्वरूप प्रदान करती है।
संसार भाव में इसे ‘योषा-वृषा’ का सिद्धान्त कहा जाता है। विज्ञान की
भाषा में पदार्थ एवं ऊर्जा कहते हैं। शास्त्रीय रूप इनका पुरूष और प्रकृति 
कहलाता है।


कन्या का ‘’ शक्ति सूचक है। पराक्रम (गति) तथा ऎश्वर्य (स्थिति) से जुड़ा है। ‘न्’ शून्य अर्थात ब्रह्म का द्योतक है। ‘या’ सम्पूर्ण या परिपूर्ण कला नियंत्रण का बोध कराता है। तो कन्या का अर्थ हुआ ब्रह्म का नियंत्रण करने वाली शक्ति।

शक्ति सुप्तावस्था में ब्रह्म ही जान पड़ती है। ब्रह्म तब निष्कल होता है। कन्या निष्कल ब्रह्म की प्रथम कला भी है। यही स्थूल रूप में प्रकृति-पुरूष की कन्या होती है। ‘’ शून्यता के साथ नाभि अथवा केन्द्र के अर्थ में भी आता है। संसार की प्रत्येक स्थूल-सूक्ष्म गतिविघि नाभि पर ही टिकी रहती है। अत: प्रारम्भ अवस्था में कन्या शुद्ध प्रकृति रूपा होती है। उसके अर्द्धनारीश्वर स्वरूप में पुरूष भाव सुप्तप्राय: जान पड़ता है, किन्तु आंखों में पूर्ण गतिशीलता बनी रहती है। गोद में रहने वाली कन्या भी हर छूने वाले स्त्री-पुरूष को छान लेती है।

ब्रह्म शक्तिमान तो है, किन्तु क्रिया भाव नहीं है। जिसका पौरूष भाव बढ़ता चला जाएगा, उसका क्रिया भाव घटता जाएगा। रावण की तरह उग्र और उष्ण होता चला जाएगा। उसका गतिमान तत्व घटता चला जाएगा। तब उपासना से श्रद्धा और समर्पण अर्जित करके स्त्रैण बनना ही पडेगा।सृष्टि ब्रह्म का विवर्त तो है, दिखाई माया देती है जो ब्रह्म को अपने भीतर बन्द रखती है। प्रकृति में नर-मादा नहीं होते। दोनों पर सभी सिद्धान्त समान रूप से लागू होते हैं। स्वरूपभिन्नता का नाम ही सृष्टि है। उनमें समानता देखना ही दृष्टि है।
हम सृष्टि का उद्भव ब्रह्म और माया के युगल तत्व रूप से मानते आए हैं। ब्रह्म केन्द्र में रहता है, माया उसे आवरित करके स्वरूप प्रदान करती है। संसार भाव में इसे ‘योषा-वृषा’ का सिद्धान्त कहा जाता है। विज्ञान की भाषा में पदार्थ एवं ऊर्जा कहते हैं। शास्त्रीय रूप इनका पुरूष और प्रकृति कहलाता है। यह स्थूल सृष्टि का संचालन करता है।
भारतीय दर्शन में कर्म योग, ज्ञान योग, भक्ति योग आदि जो कुछ भी है, वह माया का ही क्षेत्र है। माया के समुद्र में सौ साल जीने वाला जीव कैसे सूखा रहकर बाहर निकले, यह जीवन की बड़ी चुनौती है। इसी में प्रारब्ध का प्रवाह मिलता है, इसी में भविष्य के कमल खिलते हैं। खारे समुद्र में कमल का खिलना और जीवन में कामना से बाहर निकल जाना एक जैसा असंभव दिखाई देने वाला कार्य है।
आज के जीवन से लगता है कि भीतर का आकलन ही बन्द हो गया। कन्या काल के कच्चे घड़े की घड़ाई का काम ठहर गया है। इसका कारण है कि शायद मां ने भी कन्या काल का उपयोग नहीं किया। कन्या में स्त्रैण भावों को स्थाई कर देने का नाम ही “स्त्री शिक्षा” है। यह कार्य तोे महिला विद्यालयों में भी नहीं होता।
स्त्री-पुरूष कहां-कहां भिन्न हैं, कहां-कहां समान रहने चाहिए, यह दृष्टि न तो स्कूलों में दिखाई देती है, न ही घरों में। इसी उम्र में मां-बाप भी बच्चों को सूचनाओं और जानकारियों से लाद देने का  प्रयास करते हैं। नई तकनीक से जोड़कर उस बचपन की हत्या करते रहते हैं, जो मानवीय संवेदनाओं का वाहक है। उसे यांत्रिक बनाने के सारे उपक्रम किए जाते हैं। मां-बाप और स्कूल का वातावरण उसे इंसान नहीं रहने देना चाहते।
ईश्वर ने किन्हीं दो लोगों को एकसा नहीं पैदा किया। न शरीर एक जैसा, न ही विचार और भाग्य। मां-बाप और स्कूल वाले निर्ममता से सबको एक जैसा बनाने का कार्य कर रहे है। पढ़ाई के बाद फैक्ट्री के माल जैसे डिब्बे बनकर निकलते हैं। मां-बाप कितने खुश होते हैं कि बच्चा कितना रटकर तैयार हो गया। खुद को भूलकर दूसरों से आगे निकलना सीख गया है। जो विरासत पिछले जन्मों की लेकर पैदा हुआ है, वह लुटा चुका है और अपनी चेतना को जड़ बनाने का मार्ग पकड़ चुका है। ईश्वर का धक्का भले ही इसकी चेतना को कभी जाग्रत कर दे, वरना हमने तो उधर के दरवाजे सदा-सदा के लिए बन्द कर दिए हैं। दो साल का बच्चा स्कूल केवल कन्या भाव छोड़ने जाता है।
आज जो पशुता का भाव समाज में दिखाई पड़ता है, उसका कारण भी मां ही है। उसने मानव देह में पशु को जन्म दिया है। उसे पेट में संस्कारित नहीं किया। जो जीव जिस शरीर से आया, वैसा ही कार्य मानव देह में सौ साल आगे भी करता रहेगा। वह तो बचपन से ही आक्रामक दिखाई पड़ेगा। जबकि कन्या काल मूलत: साक्षी काल है। संस्कारों के अनुरूप उसका मन प्राण-वाक् से भी जुड़ सकता है अथवा आनन्द-विज्ञान से भी। किन्तु शिक्षा का दबाव इतना हो गया कि जीवन में भौतिकवाद के बाहर कुछ रह नहीं जाता। व्यक्ति अपने मूल स्वभाव को न जान पाता है, न ही उसको जी पाता है। पशु की तरह नकली जीवन जीकर सौ साल पूरे कर जाता है।
जब पुरूष में पौरूष बढ़ता है, अग्नि की आहुति होती है, तब रौद्र रूप बढ़ता है। यही आगे चलकर आसुरी भाव में बदल जाता है। जबकि कन्या भाव स्नेह एवं माधुर्य का प्रतीक है। इसमें यदि पौरूष अधिक हो गया, तब पुरूषों के प्रति आकर्षण घट जाएगा। पुरूष भी इस ओर आकर्षित कम ही होंगे। स्त्रियों की ओर आकर्षण बढ़ता ही जाएगा। दो महिलाओं का आपस में विवाह कर लेना इसकी पराकाष्ठा है। मन से सृष्टि विस्तार का भाव ही तिरोहित हो जाता है।
मां-बाप और टीचर मिलकर बच्चों को ऐसी पटरी पर चढ़ा देते हैं, कि पूरे जन्म में वो फिर लौट ही नही पाता। घर-परिवार भी छूट जाता है। मां-बाप तक के काम नहीं आता। देश के क्या काम आएगा।जो अध्यापक स्वयं मूल्यों से समझौता कर लेते हैं, जो मां बाप स्वयं बच्चों को अच्छा इंसान बनाने पर जोर नहीं देते, उस समाज का भविष्य समझ में आ सकता है। कहां तो पेट में अभिमन्यु के पैदा होने की कथा और कहां आज के बच्चों की मन:स्थिति कि मां-बाप की बात सुनी-अनसुनी कर देते हैं।
इसका कारण कन्या काल का जीव का अध्ययन है। मां-बाप गोद के अथवा छोटे बालक की उपस्थिति को शून्य या नगण्य मानकर चलते हैं।उनके आचरण का अधिकांश भाग, घर-परिवार का वातावरण एवं आपसी सम्बंधों का प्रभाव उस नन्हे जीव पर पड़ता रहता है। जब बच्चा पेट में उल्टा लटक कर अभिमन्यु बन सकता है, मां के प्रयास से मानव बन सकता है, तब सामने आंख-कान के अनुभवों को कैसे भूल सकता है! उसका शरीर देखने में छोटा लगता जरूर है, किन्तु उसके आत्माकी उम्र तो लाखों बरसों की है।
लड़कियां संवेदनाओं में अधिक गहरी होती हैं।अत: प्रकृति उनको जल्दी जीवन-संग्राम में उतार देती है। लड़कों को परिपक्व होने में अधिक समय लगता है। एक लड़की- एक लड़के की तुलना में अधिक संकल्पवान होती है, जब कि लड़का विकल्पों में अधिक भटकता है। कभी भी माया के झपट्टे में आ सकता है। जैसे-जैसे लड़कियों में पौरूष बढ़ रहा है, वे भी झपट्टों का शिकार होने लगी हैं।
घर के बदलते वातावरण, स्वतंत्रता की जगह स्वच्छन्दता की मां- बाप के मन की छटपटाहट, झूठ के अनेक मुखौटे भी अपना प्रभाव जमाते है। कन्या काल का मन अत्यन्त निर्मल होता है। जैसा देखा, सुना अंकित हो गया। ज्ञान के साथ ही इच्छा पैदा हो जाती है। मन उधर भागने लगता है या प्रतिक्रिया करने लगता है। कन्याकाल स्वजनों-परिजनों के बीच व्यवहार की भूमिका तैयार करने का काल है।
इसे दरगुजर करने का बड़ा मूल्य चुकाना पड़ सकता है। आप जैसा व्यवहार करेंगे, बच्चे उसी को ब्याज के साथ लौटाएंगे। आप चाहें तो उन्हें नौकरों के भरोसे छोड़ दें और चाहें तो टीवी के भरोसे छोड़ दें। चाहें तो पास रखे अथवा धन के अभिमान में कहीं दूर महंगे छात्रावास वाले स्कूल-कॉलेज में। श्रेष्ठतम बात तो यह है कि दादा-दादी के पास छोड़ दें। उनको मालूम है कि बच्चे कोक्या, कैसे पढ़ाया जाता है। आपका निर्णय आपकाही भविष्य बनेगा। बालक भगवान रूप, अत:न्यायवान होता है।

रामलला हम आयेंगे।

रामलला हम आयेंगे, मंदिर वहीँ बनायेंगे।
जो सिर श्रीराम ना बोले, पकड़ पकड़ लतियाएँगे।
रामलला हम आयेंगे.....

पढ़ने के लिये स्कूल ना हो, घर मे चाहे चूल्हा ना हो।
चाहे रोटी का जुगाड़ ना हो, कोई भी कारोबार ना हो।
गाय-बैल के नाम पर, जनता को लड़वायंगे।
रामलला हम आयेंगे.....

अस्पताल, सड़क, रेल व गोदाम अनाज के।
एक भी नही है आज काम के।
सरकारी स्कूल और कॉलेज।
यहां नही मिलता अब नॉलेज।
पैसे वाले को क्या दिक्कत, प्राइवेट में जाएंगे।
रामलला हम आयेंगे.....

एक हाथ मे झंडा लेलो, एक हाथ मे डंडा।
जो रोजगार की बात करे तो, देशद्रोही का देदो तमगा।
आटा मांगें, डाटा दे दो।
रोटी डाउनलोड करादो।
मोबाईल, टीवी और क्रिकेट, हर घर पहुचायेंगे।
रामलला हम आयेंगे.....

अब तो गंगा देती दुहाई, कि कैसे होगी मेरी सफाई।
चारो तरफ से नाले गिरते, नेता खाली बजट बढ़ाते।
पंडो की भी अजब है लीला, मेरे नाम का करते खेला।
लाखो टन लकड़ियों को फूंक, मुर्दा वही जलाएंगे।
रामलला हम आयेंगे.....

कोक, पेप्सी, लिम्का, माजा।
जो भी मिले गटक जा राजा।
कुंआ, बावड़ी, ताल-तैलया।
सूखते है तो सुखन दो भईया।
बेकार का हाहाकार मचा है, पानी मिलता बिस रुपया।
हवा अभी तक फ्री मिली है, उसको भी बिक़वाएँगे।
रामलला हम आयेंगे.....

रोटी-बेटी, रिस्ते-नाते, जाती एक कसौटी है।
अगड़ा, पिछड़ा, धर्म-कर्म, सबके अपने सपने है।
पांडे बोले, ठाकुर साहिब, तुम हिन्दू, हम हिन्दू।
बस अब हम जल्दी ही विश्वगुरु बन जाएंगे।
रामलला हम आयेंगे.....